चक्रवात व इसके प्रकार
चक्रवात व इसके प्रकार:- आज इस पोस्ट के माध्यम से हम आपसे चक्रवात व इसके प्रकार
के बारे में चर्चा करेंगे| चक्रवात से क्या अभिप्राय है, यह कितने प्रकार के होते है तथा इससे
बचाव के क्या उपाय है, इन सब के बारे में विस्तार से पढेंगे?
इससे पहले की पोस्ट में हम आप को “भारत के प्रमुख दर्रे” के बारे में विस्तार से बता चुके हैं|
चक्रवात का अर्थ:-
जब बहुत गर्म तथा बहुत ठंडी हवाएं एक दुसरे के विपरीत दिशा से आती हैं और एक दूसरे से
टकराती हैं तो उपर की ओर उठता हुआ एक चक्र बनना शुरू होता है अर्थात हवा के रूप में एक गोले का
निर्माण होता है जिसे चक्रवात कहते है।
चक्रवात या साइक्लोन गोलाकार रूप में घूमती हुई वायुराशि का नाम है। इसमें वायु निम्न दाब के क्षेत्र की ओर
चक्राकार रूप में तीव्र गति से प्रवाहित होती है|
गोलाकार हवा इस चक्र के बीच में तो कम दबाव होता है लेकिन बाहर की तरफ उच्च दबाव होता है।
ये गर्म तथा ठंडी चक्रवाती हवाएं बाहर से अंदर की ओर दबाव बनाती हुई चलती हैं| इन बाहर से अंदर
की ओर आने वाली चक्रवाती हवाओं का एक केंद्र होता है।
चक्रवात इतना विनाशकारी होता है कि इसके रास्ते में आने वाले पेड़, पौधे, बड़े-बड़े घर इसकी चपेट में
आकर गिर जाते है| चक्रवात के कारण बहुत से पेड़-पौधों, जन्तुओ-जानवरों, पक्षियों और मनुष्यों को
बहुत भारी नुकसान पंहुचता है।
साइक्लोन अर्थात चक्रवात के आने से कई लोगों की मौत भी हो जाती है तथा कई जानवर भी अपनी जान
गंवा देते हैं।
चक्रवात को अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
चक्रवात की परिभाषा
पिंटिगन के अनुसार “ चक्रवात अस्थिर हवाओं का गोलाकार रूप है, इनके केंद्र में कम वायुदाब होता है
और और इनके चारों ओर तेज वायुदाब वाली हवाएं चलती हैं,जिसके कारण चक्रवात उत्पन्न होते हैं|
उपरोक्त से स्पष्ट होता है कि पवनों का ऐसा चक्र जिसमें अन्दर की ओर वायुदाब कम होता है और बाहर
की ओर अधिक होता है चक्रवात कहलाता है। चक्रवात एक वृहद वायुराशि है जिसमें हवायें निम्न वायुदाब
की ओर तेज गति में घूमती हैं।
चक्रवातों के नाम:-
इसके नाम के बारे में अगर आप सुनते हैं, तो आपको इसका नाम बहुत ही अजीब-गरीब लगता होगा।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, चक्रवातों के लगभग 160 से भी अधिक
नाम बताए गए हैं।
इसे हिंद महासागर में चक्रवात के नाम से जाना जाता है| चाइना के सागर में इसे टाइफून, अटलांटिक
महासागर में इसे हरिकेन के नाम से जाना जाता है, मैक्सिको की खाड़ी में चक्रवात को टारनेडो कहते हैं|
अटलांटिक महासागर में इसे हरिकेन के नाम से जाना जाता है, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में इसे विली-विली
कहते हैं तथा साइक्लोन के रूप में जाना जाता है। चक्रवात का आकार अंग्रेजी के अक्षर V जैसा होता है।
चक्रवात की चलने की दिशा:-
इसकी चलने की दिशा दक्षिणी गोलार्द्ध में घडी की सुईयों की दिशा में होती है अर्थात क्लॉकवाइज है तथा
उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुईयों के विपरीत इसकी दिशा होती है अर्थात एंटी क्लॉकवाइज होती है।
चक्रवात की चलने की गति
इसकी ज्यादा-से ज्यादा चलने की गति 30 किलोमीटर से 300 किलोमीटर प्रति घंटा हो सकती है।
समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग इस आपदा से सबसे अधिक मात्रा में प्रभावित होते है| इसका सीधा प्रभाव
मछुआरों पर तथा तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है।
सरकार पहले ही तटीय इलाकों में इस आपदा के आने से पहले ही लोगों को तट से दूर रहने के लिए चेतावनी
जारी कर देती है तथा पहले ही एनडीआरएफ की टीम यहां उपलब्ध कर दी जाती है।
इनसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए, केंद्र सरकार व राज्य सरकार हर संभव सुरक्षा प्रदान करती है।
हमारे देश को हर साल चक्रवातों की समस्या से भी जूझना पड़ता है। जिसके कारण जान-माल का नुकसान
बहुत ज्यादा होता है।
चक्रवात के प्रभाव:-
यह एक बहुत ही विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। अगर आप तटीय क्षेत्रो में निवास करते है तो इससे
आपको सावधान रहना चाहिए। समय समय पर मौसम विभाग द्वारा जारी की गई जानकारी को ध्यान
में रखना चाहिए।
चक्रवात के बहुत ही हानिकारक तथा विनाशकारी प्रभाव होते है जिनका वर्णन निम्न प्रकार से किया जा
सकता है| चक्रवात के दौरान तेज हवा के साथ तेज बारिश भी होती है जिस कारण से बहुत सारे पेड़ पौधे
तथा मकान गिर जाते है। इससे खड़ी फसलों को बहुत नुक्सान पहुँचता है। इनके आने से संचार व्यवस्था
ठप हो जाती है।
बहुत तीव्र गति से चलने वाली हवा के कारण सड़क के किनारे पेड़ सड़क पर गिर जाते है। जिससे यातायात
प्रभावित होता है। चक्रवात के कारण बिजली के खम्भे गिर जाते है तथा बिजली की तारे सड़क पर गिर जाती
है जिससे लोगो को दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसकी चपेट में आने से जान भी जा सकती है अत:
इससे सभी को सतर्क रहना चाहिए।
चक्रवात के प्रकार
इन चक्रवातों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-
1.-उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात
2.-शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात
1.–उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात:-
अयन वर्ती क्षेत्रों के मध्य उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है। विश्व में इन चक्रवातों को अलग-
अलग नामों से पुकारा जाता है। उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की उत्पत्ति बहुत विशाल गर्म सागरों के द्वारा
होती है जहां पर समुद्र तल का तापमान 250 से0 से भी अधिक हो जाता है।
विषुवत रेखा के निकट यह ताप होता है लेकिन पृथ्वी का घूर्णन शून्य होना चाहिए। इसी कारण चक्रवात
विषुवत रेखा से दूर अक्षांशों पर उत्पन्न होते है। ये चक्रवात बहुत अधिक विनाशकारी वायुमण्डलीय तूफान
होते हैं। इन में पवन का वेग अति तीव्र होता है। तेज मूसलाधार वृष्टि होती है। तट्टीय क्षेत्र में तीव्र वेग से
हवा चलती है| तेज वर्षा तथा उच्च ज्वारीय तरंगों के कारण जल प्लावन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तथा धन व
जन की काफी मात्रा में हानि होती है।
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अत्यधिक विनाशकारी प्रचण्ड वेग वाले तथा प्राकृतिक प्रकोप है। इसके कारण
पिछले 2 दशकों के दौरान विश्व के अनेक देशों में लाखों लोगों की मृत्यु हो चुकी है। ऐसा माना जाता है कि
चक्रवात से प्रति वर्ष दस हजार मनुष्य काल के मुह में समा जाते हैं। चक्रवातों के द्वारा ना केवल सागरीय
तटीय क्षेत्र ही प्रभावित होते है बल्कि प्राकृतिक भूदृश्य तथा जंगली क्षेत्रों को भी बड़ी मात्रा में हानि पहुँचती हैं।
चक्रवात तथा इसके प्रकार
ये चक्रवात प्राकृतिक आपदा वाले प्रकोप होते हैं। इनके द्वारा सामाजिक तथा पर्यावरणीय प्रभाव और आर्थिक
नुकसान व्याकप रूप में होता है। लेकिन विकसित देशों में पिछले कुछ वर्षों से जनधन की हानि कम हुई है।
इसका प्रमुख कारण यही है कि इन देशों में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातीय तूफानों की अग्रिम
जानकारी लोगों को शीघ्र उपलब्ध करा दी जाती है। इन देशों में आपदा प्रबन्धन की पूर्व सूचना उसकी
तैयारी और निवारण की अच्छी व्यवस्था है।
इसके विपरीत विकासशील देशों में आपदा के सम्बन्ध में पूर्व सूचना, इनके निवारण एवं
न्यूनीकरण के लिए आवश्यक संसाधनों का काफी अभाव है। अत: जन और धन की अधिक हानि होती है।
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात निम्न रूपों में हानि पहुँचाते हैं-
1.-इनसे खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है तथा पालतू पशु और जंगली जानवर भी मर जाते हैं।
2.- समुद्र तटीय क्षेत्र अधिक प्रभावित होते है| अत्यधिक प्रचण्ड चक्रवात आने पर धन और जन की बड़ी हानि होती है।
3.- चक्रवात के तीव्र पवन वेग से घरों की छत उड़ जाती है तथा इनके द्वारा भवनों को मलबे के ढेर के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है।
4.- पवन वेग के तीव्र गति के कारण घर के बाहर रखी वस्तु उड़कर दूर-दराज के क्षेत्र में चली जाती है|
5.- वन तथा अन्य प्राकृतिक वनस्पती नष्ट हो जाती हैं।
6.- पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं घटती है| चक्रवातीय वर्षा के कारण पहाड़ी क्षेत्रों के मार्ग अवरूद्ध हो जाते हैं। रिहायशी वाले क्षेत्र को भी बड़ी मात्रा में हानि उठानी पड़ती है।
7.- चक्रवातीय वर्षा से नदियों में बाढ़ आ जाती है इस कारण से निचले इलाकों में जल के भराव के कारण अनेक बीमारी फैलने का डर लगा रहता है।
चक्रवात से होने वाली हानि
8.- चक्रवात से प्रभावित क्षेत्रों में सीवरेज तथा पानी की पाइप लाइने टूट जाती है इस कारण से मल आदि फैलने के कारण व्यक्ति संक्रामक रोगों की चपेट में आ जाते हैं।
9.- स्वास्थ्य सुवीधायें तथा अस्पताल भी क्षतिग्रस्त हो जाते हैं इससे बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों को चिकित्सा सुविधा तथा उपचार सही समय पर नहीं मिल पाता है।
10.- चक्रवातों से उत्पन्न सागरीय लहरों के कारण समुद्री जहाज टूट जाते है जिसमें कई लोग मर जाते है। जहाज में कीमती सामान हो तो आर्थिक क्षति भी उठानी पड़ सकती है।
11.- चक्रवात के कारण घरों के नष्ट होने पर लोग बेघर हो जाते हैं तथा बहुत सारे लोग अन्यत्र पलायन कर जाते हैं।
12.- मकानों, सीवरेज लाइनस, बिजली की लाइनस तथा पाइप लाइनों आदि की मरम्मत में बहुत अधिक धन खर्च होता है।
13.- चक्रवातीय वर्षा से सागर के तट का भी तथा पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचता है।
14.- इसके कारण परिवहन एवं संचार प्रणाली ठप पड़ जाती है| विद्युत की आपूर्ति एवं जल आपूर्ति भी बाधित हो जाती है।
15.- रोजगार पर भी इसका असर पड़ता है तथा लोग रोजगार की तलाश में नगरों की ओर प्नस्थान कर जाते हैं।
16.- फसलों और पशुधन का भी बड़ी मात्रा में नुकसान होने के कारण व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रसित हो जाते हैं।
17.- बेरोजगारी की समस्या बढने से समाज में चोरी तथा छिना-झपटी के अपराध बढ़ जाते हैं|
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात के लक्षण
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों में वायुदाब केन्द्र में कम होता है। इस कारण से वायु बाहर से अंदर की तरफ तेज गति से प्रवेश करती है|
ये अधिकतर ग्रीष्म काल में आते हैं| गरमी की ऋतु में वायु अधिक गर्म होकर तेजी से उपर उठती है|
यह चक्रवात सागरीय भाग में तीव्र गति से चलते हैं। तटवर्ती क्षेत्र तक पहुँचते-पहुँचते इनकी गति कम हो जाती है। इसी कारण ये तटवर्ती भागों में अधिक वर्षा करते हैं जबकि आन्तरिक भागों में पहुँचने से पहले समाप्त हो जाते हैं। ये एक स्थान पर काफी समय तक रह सकते हैं तथा वे उस स्थान पर कई दिनों तक अधिक वर्षा करते हैं।
2.-शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात:-
शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की उत्पत्ति 300 से 650 अक्षांशों के बीच में होती है। यहाँ पर उष्ण कटिबन्धीय तथा ध्रुवीय वायुराशियों का अपक्षय होता है। इन चक्रवातों का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होता है क्यों कि ये पश्चिमी वायु प्रवाह से सम्बन्धित होते हैं।
इन चक्रवातों की उत्पत्ति और विकास शरद ऋतु में अधिक होती है।
इनकी उत्पत्ति के दो क्षेत्र हैं-
1.-उत्तरी प्रशान्त महासागर का पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र से लेकर अल्यूशियन निम्न क्षेत्र का विस्तृत महासागरीय तल।
2.-उत्तरी आन्ध्रमहासागर के पश्चिमी किनारे से लेकर आइसलैण्ड स्थित निम्न दाब वाले क्षेत्र के मध्य का भाग।
उपरोक्त के अलावा चीन, फिलीपीन्स तथा साइबेरिया के निकटवर्ती क्षेत्रों में भी इनकी उत्पत्ति होती है।
शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात के लक्षण
(क).-इन चक्रवातों में हवायें बहुत मंद गति से चलती है जबकि उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात में हवायें तीव्र वेग से चलती हैं।
(ख).-इनकी दिशा सदा पश्चिम से पूर्व की ओर होती हैं।
इनके पूर्वी क्षेत्रों में पूर्वी हवाए तथा उत्तरी क्षेत्रों में उत्तरी पूर्वी हवायें
चलती हैं| इनके उत्तरी पश्चिमी खण्ड में उत्तर से पश्चिम की दिशा में हवायें चलती हैं।
(ग).-इस चक्रवात के अलग अलग भागों में तापमान भी भिन्न रहता है। इनके अग्रभाग में उष्ण कटिबन्धीय गर्म हवाओं के कारण तापमान अधिक तथा पृश्ठ भाग में नम हवाओं के कारण तापमान कम रहता है।
(घ).-इन चक्रवातों में शरद ऋतु में वर्षा बहुत ज्यादा होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में ये अधिक विकसित नहीं होते।
(ङ).-इनमें गति अनिश्चित होती है। ग्रीष्म ऋतु की तुलना में शीत ऋतु में इनकी गति बहुत अधिक होती है।
उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों की बजाय उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात अधिक भयावह तथा विनाशकारी होते हैं। इनके आने से तेज वृष्टि, तीव्र गति पवन वेग तथा फ्लड की स्थिति पैदा हो जाती है।